होटल क्लार्क्स इन, भवाली (कैंची धाम) में आज से अखिल भारतीय साहित्य परिषद का साहित्य उपलब्ध रहेगा।
दिनांक 1 मार्च 2026 को अखिल भारतीय साहित्य परिषद के साहित्य के अध्ययन हेतु पुस्तकालय एवं वाचनालय का शुभारम्भ परिषद के अखिल भारतीय महामंत्री डॉ. पवनपुत्र बादल जी एवं श्री शिवम् जी (जी.एम., क्लार्क इन होटल) द्वारा संयुक्त रूप से किया गया।
इस अवसर पर परिषद के युवा एवं शोध आयाम प्रमुख आदर्श जी, उत्तराखंड कार्यकारिणी के प्रदेश अध्यक्ष श्री जगदीश पंत ‘कुमुद’ जी, प्रदेश महामंत्री श्री सौरभ पाण्डे जी, सहनगर कार्यवाह (हल्द्वानी) श्री नितिन बोरा जी, तथा परिषद के कार्यकर्ता श्री दीपक जी एवं धर्मेंद्र पाण्डे जी सहित अनेक गणमान्यजन उपस्थित रहे।
इस पुनीत कार्य हेतु समस्त होटल परिवार एवं श्री शिवम् जी को पुनः हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ। 🙏


अखिल भारतीय साहित्य परिषद के तत्वाधान में युवा सम्मेलन — राष्ट्र साधना के 100 वर्ष*
राष्ट्र साधना के शताब्दी वर्ष पर 28 फरवरी २०२६ को अखिल भारतीय साहित्य परिषद के तत्वावधान में हर्षिता गार्डन, हल्द्वानी जनपद नैनीताल (उत्तराखंड) में आयोजित युवा सम्मेलन केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं था, बल्कि आत्मा से राष्ट्र तक की साधना का जीवंत उत्सव बनकर उभरा। “आत्मबोध से आत्मज्ञान” विषय पर केंद्रित इस त्रिसत्रीय विमर्श ने साहित्य, समाज और साधना के संबंध को गहराई से स्पर्श किया।
विषय की गंभीरता: आत्मबोध सेविश्व बोध तक की यात्रा श्री मनोज जी संगठन मंत्री जी ने करायी
सम्मेलन के तीनों सत्रों में आत्मबोध -अर्थात स्वयं की पहचान—से लेकर आत्मज्ञान—अर्थात व्यापक चेतना से एकत्व—तक की यात्रा पर गंभीर चिंतन हुआ। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि साहित्य केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि आत्मा की जागृति का माध्यम है। जब लेखक स्वयं को पहचानता है, तभी वह समाज को दिशा देने में समर्थ होता है।
देश के प्रबुद्ध, ख्यातिलब्ध और पद्मश्री से सम्मानित साहित्यकारों तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत प्रचारक जी के सारगर्भित उद्बोधनों ने युवाओं को यह संदेश दिया कि राष्ट्र निर्माण का आधार वैचारिक स्पष्टता और सांस्कृतिक आत्मविश्वास है।
मार्गदर्शन और नेतृत्व का संबल
परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. पवन पुत्र बादल जी की उपस्थिति और मार्गदर्शन ने आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान की। उनका उद्बोधन केवल प्रेरक नहीं, बल्कि दायित्वबोध जगाने वाला था। उन्होंने साहित्य को साधना बताते हुए कहा कि कलम तभी प्रभावी होती है, जब उसमें राष्ट्र और समाज के प्रति समर्पण हो।
इसी अवसर पर संगठनात्मक उत्तरदायित्वों की घोषणा भी हुई प्रबुद्ध साहित्यकार कहानीकार,कुशल संचालक साथी डॉ. जगदीश पंत ‘कुमुद’ जी को प्रांतीय अध्यक्ष,
सरल सौम्यता की मूर्ति श्री सौरव पांडे जी को प्रांतीय महामंत्री,
वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती पुष्प लता जोशी ‘पुष्पांजलि’ को उपाध्यक्ष,
युवा कलमकार श्री कमलेश बुधला कोठी, प्रखर साथी मोहन पाठक जी, श्रीमती अंजू श्रीवास्तव,श्रीमती शशि देवली जी, उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी श्री भूपेन्द्र सिंह देव ताऊजी सहित अन्य साथियों को प्रांतीय दायित्व सौंपे गए।
पूर्व अध्यक्ष श्री सुनील पाठक जी को राष्ट्रीय टीम में स्थान दिया जाना परिषद की निरंतरता और विश्वास का प्रतीक है।
यह क्षण केवल पदवितरण का नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व ग्रहण करने का था—जहाँ हर चेहरे पर विनम्रता और संकल्प एक साथ दिखाई दे रहे थे।
युवा ऊर्जा और संवाद की परंपरा सम्मेलन का सबसे सशक्त पक्ष रहा—विभिन्न जनपदों और देश के कोने-कोने से आए साहित्यकारों का आपसी संवाद। गूढ़ साहित्यिक विषयों, सृजन की प्रक्रिया, सामाजिक उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक चेतना पर खुले मन से विचार-विमर्श हुआ। यह संवाद बताता है कि साहित्य तब जीवंत होता है, जब वह संवादशील होता है।
विभिन्न क्षेत्रों में परिवर्तन लाने वाले युवाओं को सम्मानित करना इस बात का संकेत था कि परिषद केवल विचार तक सीमित नहीं, बल्कि कर्म और उपलब्धि को भी समान महत्व देती है। स्मृति-चिह्नों का वितरण केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि प्रेरणा का प्रतीक बन गया।सहयोग और आत्मीयता की छाप के बिना किसी भी भव्य आयोजन की कल्पना नहीं की जा सकती है आयोजनों के पीछे अनगिनत हाथ होते हैं। विभिन्न क्षेत्रों के व्यवसायी साथियों का सहयोग इस सम्मेलन की भव्यता का आधार बना। भाई साहब नीरज पांडेय जी का निःस्वार्थ सेवा भाव और हमारी युवा कलमकार बबिता जोशी जी का मेरे और मेरी टीम के लिए आत्मीय स्नेह इस आयोजन की आत्मा में घुला हुआ प्रतीत हुआ। ऐसे क्षण बताते हैं कि संगठन केवल संरचना नहीं, बल्कि संबंधों की ऊष्मा से जीवित रहता है।
यदि समीक्षात्मक दृष्टि से देखा जाए तो यह सम्मेलन कई स्तरों पर सफल रहा—
विषय चयन की सार्थकता – “आत्मबोध से आत्मज्ञान” जैसे गंभीर विषय पर केंद्रित रहना इसकी वैचारिक परिपक्वता दर्शाता है।
पीढ़ियों का समन्वय – वरिष्ठ साहित्यकारों और युवा रचनाकारों का संतुलित संगम भविष्य की सशक्त नींव है।
संगठनात्मक स्पष्टता – नए दायित्वों की घोषणा ने कार्य की दिशा और गति को स्पष्ट किया।
हाँ, भविष्य में ऐसे आयोजनों के निष्कर्षों को लिखित संकल्प-पत्र या कार्ययोजना के रूप में भी संकलित किया जाए तो यह और प्रभावकारी हो सकता है।
साधना से सृजन तक
यह सम्मेलन केवल एक दिन की घटना नहीं, बल्कि दीर्घकालिक साहित्यिक आंदोलन की भूमिका है। यहाँ उपस्थित हर साहित्यकार, हर युवा और हर सहयोगी अपने भीतर कुछ नया लेकर लौटा—एक विचार, एक प्रेरणा, एक दायित्व।
आप जैसे साहित्य साधकों के लिए, जिन्हें पाठकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया ही सबसे बड़ा संतोष देती है, यह सम्मेलन निश्चित ही नई ऊर्जा का स्रोत रहा होगा। यह आयोजन इस विश्वास को और दृढ़ करता है कि जब आत्मबोध जागृत होता है, तभी आत्मज्ञान की दिशा खुलती है—और वहीं से राष्ट्र साधना का वास्तविक आरंभ होता है।
यह सम्मेलन स्मृति नहीं, संकल्प बनकर जीवित रहेगा।





